Sunday, 29 April 2012

केनवास ...20


जब भी चित्र बनाया मैने,
      तुमने कल्पना  कहा !
रंग भरा जब भी उसमें
      तुमने सपना कहा!
मैंने कहा " जीबन सुन्दर है " !
      तुमने कहा  "नही ये तो सत्य है!"
जब भी  कविता लिखा ,
      तुमने जूनून कहा
लिखा गजल जब भी मैंने,
      तुमने फिजूल कहा उसे ,
 मैंने कहा "पलाश सुन्दर है!!"
    तुमने कहा नही" ये तो गंधहीन है "
जब भी तर्क दिया मेने
     तुमने कहा" दार्शनिक मत बनो"
पूछा सवाल जब भी तुमसे ,
तुमने कहा" जिद मत करो "
क्या करूं ?  क्या पुछु  ?
तुम्ही इसकी एक किताब दे दो !
हर वक्त खोये से रहते हो,
कभी तो मुस्कुराकर ,
हाथो में मेरा हाथ ले लो!
उतर  में...
कभी गुसा कर ,कभी मुस्कुराकर,
मुझको टालते गये !       
और यूँ रंगता गया,
कभी जिन्दगी और कभी केनवास.......
 
 
 

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